महंगा माने अच्छा!

दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया में उच्च शिक्षा के सबक सीखने के बाद बिहार के एक ग्रामीण हिस्से में शिक्षा की अलख जगाते एक युवा मित्र से पिछले दिनों बातचीत हो रही थी। वह दिल्ली में पढ़ाई के दौरान जितना ऊर्जावान और आश्वस्त नजर आता था, आजकल उतना ही उलझन और असमंजस से ग्रस्त रहता है।

देश की राजधानी में रहते हुए उसे अपने आसपास जो लोग मिलते थे, उनमें से ज्यादातर के सोच और व्यवहार से वह असहमत रहता था, लेकिन उनका बिहेवियर पैटर्न उसके अंदर किसी तरह का कन्फ्यूजन नहीं पैदा करता था। चाहे क्लास में पढ़ाई की बात हो या करियर में फोकस की, लगभग सबका रुझान उसे एक जैसा ही नजर आता था – आगे ले जा रही राह पर नजर बनाए रखना औऱ कदम बढ़ाते जाना।

वह राह कितने लोगों को, किस दिशा में और कैसे गंतव्य की ओर ले जा सकती है, जैसे सवालों से दूर रहने की सलाह उसे हर तरफ से मिलती थी।

इस भेड़चाल से आजिज होकर उसने राजधानी दिल्ली से बोरिया-बिस्तर बांधा और तीन साल के एक प्रोजेक्ट के सहारे ग्रामीण अंचल के एक छोटे से शहर में खुद को सेट्ल करने की सोची। एक प्रोजेक्ट पूरा हुआ तो दूसरा शुरू हो गया। इस लिहाज से उसके काम को वहां काफी हद तक निरंतरता मिल गई है। वहां अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे ऐसे लोग उसे मिले, उससे जुड़े जिनके सोच और व्यवहार की दिशा उससे मेल खाती है। यह तथ्य उसे सुकून देता है।

लेकिन वहां बहुत कुछ ऐसा भी है, खासकर आम लोगों के व्यवहार में, जो उसे समझ नहीं आता, कन्फ्यूज करता है।

मिसाल के तौर पर वहां कुछ लोगों के प्रयास से एक बड़ा, बढ़िया और सस्ता हॉस्पिटल खोला गया है। स्पेशलिस्ट डॉक्टरों और आधुनिक मशीनों से लैस उस अस्पताल को शुरू करने के प्रयासों में वह भी शामिल रहा है। उसे पता है कि अच्छा और सस्ता इलाज उस क्षेत्र की जरूरत है। मगर प्रत्यक्ष अनुभव उसकी इस समझ पर सवाल उठा रहा है।

गरीब मरीज और उनके परिजन आते हैं, लेकिन डॉक्टरों से बातचीत करने और अस्पताल की व्यवस्था की जानकारी लेने के बाद किसी न किसी बहाने वहां से निकल लेते हैं। वापस नहीं लौटते। कारण? यह कि सस्ते, बल्कि लगभग फ्री इलाज की बात उन मरीजों के मन में इलाज की क्वॉलिटी को लेकर संदेह पैदा कर देती है।

फीस के आधार पर डॉक्टर की क्वॉलिटी तय करने की इस प्रवृत्ति के बारे में हम अक्सर डॉक्टर मित्रों के मुंह से भी सुनते रहते हैं। यह प्रवृत्ति कई डॉक्टरों को मोटी फीस रखने का तार्किक आधार या कम से कम एक ठोस बहाना मुहैया करा देती है। अब उस अस्पताल के संचालक और उससे जुड़े डॉक्टर भी वहां फी बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं।

तो क्या यह मान लिया जाए कि उस इलाके में लोगों को सस्ते इलाज की वास्तव में कोई जरूरत नहीं है? या यह इलाज की मौजूदा व्यवस्था और जनसेवा के नाम पर चलने वाले पाखंड से लोगों में उपजे उस गहरे अविश्वास की झलक है, जो उन्हें अपने प्रियजनों की जान बचाने के लिए आर्थिक बर्बादी का जोखिम उठाने की ओर ले जा रहा है?

युवा मित्र की उलझन यही है कि अगर दूसरी बात सच हो तब भी हालात तो महंगे इलाज की ही तरफदारी कर रहे हैं। ऐसे में सस्ता इलाज उपलब्ध कराने के लिए क्या इतना जीतोड़ प्रयास करने का कोई मतलब भी बनता है?

(रेखाचित्र : प्रतीकात्मक। एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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